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रत्न विज्ञान

राशि रत्न खरीदें मगर परखकर

रत्नों का गोरख धंध :-

मनुष्य की सहत प्रकृति है कि वह हमेंशा सुख में जीना चाहता है परन्तु विधि के विधान के अनुसार धरती पर र्इश्वर भी जन्म लेकर आता है तो ग्रहों की चाल के कारण उसे भी सुख-दु:ख सहना ही पड़ता है, हम अपने जीवन में आने वाले दु:खों को कम करने अथवा उससे बचने हेतु उपाय चाहते हैं। उपाय के तौर पर हम अपने जीवन में अपनी कुण्डली की जांच करवाते हैं तो ज्योतिषी पूजा भी करवाते हैं अथवा रत्नों को धारण करवाते हैं। रत्न पहनने के पश्चात भी समस्यायें सामने खड़ी रहती हैं तो ज्योतिष शासित्रयों के ऊपर से विश्वास डोलने लगता है। आज-कल बहुत से नकली रत्न बाजार में है जिनका गोरख धन्धा चलता रहता है। अत: सावधानी पूर्वक सही रत्न चुनाव करके ही धारण करें।

  • रत्न में जितनी अधिक पारदर्शिता होती है वह उतना ही अच्छा होता है।
  • रत्न टूटा व खंडित नहीं होना चाहिए।
  • कोर्इ भी रत्न धारण करने से पहले उसे चार्ज कराया जाता है जो पुरोहित जानकार होगा उसे मालूम रहता है कि कौन से रत्न को किस मंत्र जाप से अभिमंत्रित करके सिद्ध करना चाहिए।

रत्नों के द्वारा रोग उपचार:

  • भूलने की बीमारी और रत्न चिकित्सा :-

    इस रोग में बीती हुर्इ बहुत सी घटनाएँ अथवा बातें याद नहीं रहती, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुण्डली में जब लग्न एवं लग्नेश पाप युक्त होते हैं तो इस प्रकार की सिथति होती है। सूर्य और बुध जब मेष राशि पर होता है तो स्मृति दोष उत्पन्न होता हैै। साढे साती के समय जब शनि की महादशा चलती है तो भूलने की सम्भावनाएँ प्रकट होने लगती हैं रत्न चिकित्सा पद्धति के अनुसार ऐसे व्यकितयों को मोती एवं माणिक्य धारण करना चाहिये।

  • सफेद दाग और रत्न चिकित्सा :-

    सफेद दाग त्वचा सम्बन्धी रोग है, इस रोग में त्वचा पर सफेद चकते उमर आते हैं जब चन्द्र राशि में चन्द्र, मंगल, शनि का योग बनता है तब यह रोग उत्पन्न होता है। बुध के शत्रु राशि पर होने पर भी यह सम्भावना प्रबल हो जाती है, इस रोग की सिथति में हीरा पुखराज धारण करना चाहिये।

  • मधुमेह और रत्न चिकित्सा :-

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मधुमेह अर्थात डायविटीज की सामना उस सिथति में होता है जब कर्क, वृश्चिक अथवा मीन राशि में पाप ग्रह की संख्या दो या उससे अधिक रहती है। अष्टमेश एवं षष्ठेश दोनो एक दूसरे के विपरीत घरों में हो तो भी मधुमेह की रोग होता है। रत्न चिकित्सा के अनुसार मूँगा अथवा पुखराज धारण करना चाहिये।

  • दन्त रोग और रत्न चिकित्सा :-

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार दाँतों का स्वामी बृहस्पति होता है कुण्डली में बृहस्पति पीडित होने पर दाँतों की तकलीफ का समाना करना पड़ता है। मूँगा अथवा पुखराज इस रोग का इलाज है, लोहे का कड़ा भी धारण किया जा सकता है।

  • उच्च रक्तचात एवं रक्त चिकित्सा :-

    चन्द्रमा हृदय का स्वामी है चन्द्रमा के क्षीण होने पर इस रोग की सम्भावना प्रकट होती है। पाप ग्रह, राहु, केतु जब चन्द्रमा के साथ उपसिथत रहते हैं तब उच्च रक्तचाप का रोग होता है। इस रोग में मूँगा धारण करना चाहिये। चन्द्र का रत्न मोती, मून स्टोन (चन्द्रकान्त मणि) और ओपल भी धारण किया जा सकता है।

  • त्वचा रोग और रत्न चिकित्सा :-

    शुक्र त्वचा का स्वामी ग्रह है, बृहस्पति अथवा मंगल क्षीण होने पर त्वचा सम्बन्धी रोग (दाद, खाज, खुजली, एक्जीमा) उत्पन्न होते हैं। इस रोग में स्फटिक, हीरा और मूँगा धारण करना चाहिये।

  • बबावीर व रत्न चिकित्सा :-

    बवासीर गुदा का रोग है, कुण्डली में सप्तम भाव गुदा का कारक है। सप्तम भाव में पाप ग्रह मौजूद रहने पर इस रोग की सम्भावना होती है। इस रोग में चन्द्रकान्त मणि मोती धारण करना चाहिये।