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भूत प्रेत बाधा

प्राय: सुनने में आता है कि उसके ऊपर भूत आ गया है या उसको प्रेत ने पकड़ लिया है जिसके कारण उसके घर वाले बहुत परेशान हैं। उसको संभाल ही नहीं पाते हैं। तानित्रक, मौलवी या ओझा के पास जाकर भी भी कुछ नहीं हुआ है, समझ नहीं आता है क्या करें। भूत-प्रेत बाधा है या नहीं।

आप अपनी या किसी की कुण्डली देखें और यदि ये योग उसमें विधमान हैं तो समझ लें कि जातक या जातिका भूत-प्रेत बाधा से परेशान हैं, ये योग इस प्रकार हैं :-

पहला योगः

कुण्डली में पहले भाव में चन्द्र के साथ राहु हो और पांचवे और नौवे भाव में क्रूर ग्रह सिथत हों। इस योग के होने पर जातक या जातिका पर भूत-प्रेत, पिशाच या गन्दी आत्माओं का प्रकोप शीघ्र होता है। यदि गोचर में भी यही सिथति हो तो अवश्य ऊपरी बाधाएँ तंग करती हैं।

दूसरा योग :

यदि किसी कुण्डली में शनि, राहु, केतु या मंगल में से कर्इ भी ग्रहस सप्तम भाव में हो तो ऐसे लोग भी भूत-प्रेस बाधा या पिशाच या ऊपरी हवा आदि से परेशान रहते हैं।

तीसरा योग :

यदि किसी की कुण्डली में शनि-मंगल-राहु की युति हो तो उसे भी ऊपरी बाधा, प्रेत पिशाच या भूत बाधा तंग करती है। उक्त योगों में दशा-अन्र्तदशा में भी ये ग्रह आते हों और गोचर में इन योगों की उपसिथति हो तो समझ लें कि जातक या जातिका इस कष्ट से अवश्य परेशान है।
इस कष्ट से मुकित के लिए तानित्रक, ओझा, मौलवी या इस विषय के जानकार ही सहायता करते हैं।इतझयदि कुण्डली में इस प्रकार के योग हों तो इनसे बचने के लिए योगकारक ग्रहों के उपाय अथवा यहां एक प्रयोग बता रहे हैं उसे कर सकते हैंं।
यहां एक मन्त्र दे रहे हैं जिसे स्नान केरके हनुमान मनिदर में 108 बार प्रतिदिन जपें और 45 दिनों तक नित्य करें। किसी भी शुक्लपक्ष के मंगलवार से प्रारम्भ कर सकते हैं।

भूत-प्रेत बाधा निवारक हनुमत मन्त्र इस प्रकार हैं :-

भूत प्रेत बाधा नाशक मन्त्र

ऊँ ऐं हीं श्रीं हीं हूं हैं ऊँ
नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत पिशाच-शाकिनी-डाकिनी यक्षणी-पूतना-मारी-महामारी, यक्ष राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकम क्षणेन हन हन भंजय भंजय मारय मारय शिक्षय शिक्ष्य महामारेश्रवर रूद्रावतार हुं फट स्वाहा।

उक्त मंत्र को श्रद्वा, विश्वास के साथ जप कर मन्त्र से अभिमनित्रत जल पीडि़त जातक या जातिका को पिलाने या छींटे मारने से इस प्रकार की बाधा से मुकित मिलती है।

अत: उन्हीं की प्रेरणा द्वारा जो शिक्षा एवं दीक्षा प्राप्त की थी उन्हीें के चरण चिन्हों पर चलकर एक सफल ज्योतिषी बनने का संकल्प धारण करके ज्योतिषीय ज्ञान गंगा को प्रचारित व प्रसारित करने की भीष्म प्रतिज्ञा कर रखी है।

निर्बल मन या अल्प मनोबली व्यकित के ऊपरी बाधा से मुकित दिलाने वाले प्रयोग को नहीं करना चाहिए।
ये प्रयोग आसितक एवं प्रभु पर विश्वास करने वाला ही कर सकता है। यदि मनोबली है तो आप स्वयं और दूजों का लाभ पहुँचा सकते हैं।

भूत-प्रेतों की गति एवं शकित अपार होती है। इनकी विभिन्न जातियाँ होती हैं और उन्हें भूत, प्रेस, राक्षस, पिशाच, यम, शाकिनी, डाकिनी, चुडै़ल, गंधर्व आदि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है।

ज्योतिष के अनुसार राहु की महादशा में चन्द्र की अंतर्दशा हो और चन्द्र दशापति राहु से भाव 6, 8 या 12 में बलहीन हो, तो व्यकित पिशाच द्वेष से ग्रस्त होता है। वास्तुशस्त्र में भी उल्लेख है कि पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद, ज्येष्ठा, अनुराधा, स्वाति या भरणी नक्षत्र में शनि के सिथत होने पर शनिवार को गृह-निर्माण आरंभ नहीं करना चाहिए, अन्यथा वह घर राक्षसों, भूतों और पिशाचों से ग्रस्त हो जायेगा। इस सन्दर्ीा में संस्कृत का यह श्लोक दृष्टव्य है :-

अजैकपादहिबर्ुध्न्यषक्रमित्रानिलान्तकै:।
समन्दैमेन्दवारे स्याद रक्षोभूतयुतगधहम।।

भूतादि से पीडि़त व्यकित की पहचान उसके स्वभाव एवं क्रिया में आये बदलाव से की जा सकती है। इन विभिन्न आसुरी शकितयों से पीडि़त होने पर लोगों के स्वभाव एवं कार्यकलापों में आये बदलावों का संक्षिप्त विवरण यहां प्रस्तुत है।

भूत पीड़ा :

भूत से पीडि़त व्यकित किसी विश्यवास की तरह बात करता है। मूर्ख होने पर भी उसकी बांतो से लगता है कि वह कोर्इ ज्ञानी पुरूष हो। उसमें गजब की शकित आ जाती है। क्रुद्ध होने पर वह कर्इ व्यकितयों को एक साथ पछाड़ सकता है। उसकी आखें लाल हो जाती है और देह में कंपन होता है।

यक्ष पीड़ा :

यक्ष प्रभावित व्यकित लाल वस्त्र में रूचि लेने लगता है। उसकी आवाज धीमी और चाल तेज हो जाती है इसकी आंखें ताबें जैसी दिखने लगती हैं। वह ज्यादातर आंखों से इशारा करता है।

पिशाच पीड़ा :

पिशाच प्रभाविश व्यकित नग्न होते से भी हिचकता नहीं है। वह कमजोर हो जाता है और कटु शब्दों का प्रयोग करता है वह गंदा रहता है और उसकी देह से दुर्गन्ध आती है उसे भूख बहुत लगती है। वह एकान्त चाहता है और कभी-कभी रोने भी लगता है।

शाकिन पीड़ा :

शाकिनी से सामान्यत: महिलायें पीडि़त होती हैं। शाकिनी से प्रभावित स्त्री को सारी देह दर्द रहता है। उसकी आँखों में भी पीड़ा होती है। वह अक्सर बेहोश भी हो जाया करती है। वह रोती और चिल्लाती रहती है, वह कांपती रहती है।

प्रेत पीड़ा :

प्रेत से पीडि़त व्यकित चीखता-चिल्लाता है, रोता है और इधर-उधर भागता रहता है। वह किसी का कहा नहीं सुनता। उसकी वाणी कटु हो जाती है। वह खाता पीता नहीं है और तीव्र स्वर के साथ सांसे लेता है।

चूडैल :

चूडैल प्रभावित व्यकित की देह पुष्ट हो जाती है। वह हमेंशा मुस्कराता रहता है और मांस खाना चाहता है।

इस तरह भूत-प्रेतादि प्रभावित व्यकितयों की पहचान भिन्न-भिन्न होती है। इन आसुरी शकितयों को वश में कर चुके लोगों की नजर अन्य लोगों को भी लग सकती है। इन शकितयों की पीड़ा से मुकित हेतु निम्नलिखित उपाय करने चाहिये।

यदि बच्चा बाहर से खेलकर, पढ़कर, घूमकर आये और थका घबराया परेशान सा लगे तो उसे नजर या हाय लगने की पहचान है। ऐसे में उसके सर से 7 लाल मिर्च और एक चम्मच रार्इ के दाने 7 बार घुमकारकर उतारा कर लें और फिर आग में जला दें।

यदि बेवजह डर लगता हो, डरावने सपने आते हों, तो हनुमान चालिसा और गजेन्द्र मोक्ष का पाठ करें और हनुमान मंदिर में हनुमान जी का श्रंगार करें व चोला चढ़ायें।

व्यकित की बीमार होने की सिथति में दवा काम नहीं कर रही हो, तो सिरहाने कुछ सिक्के रखें और सबेरे उन सिक्कों को शमशन में डाल आयें।

व्यवसाय बाधित हो, वांछित उन्नति नहीं हो रही हो तो 7 शनिवार को सिंदूर, चादी का वर्क, मोती चूर के पांच लडडू, चमेली का तेल, मीठा पान, सूखा नारियल और लौंक हनुमान जी को अर्पित करें।

किसी काम में मन न लगता हो, उचाट सा रहता हो तो रविवार को प्रात: भैरव मदिरा अर्पित करें और खाली बोतल को सात बार अपने सरसे उतारकर पीपल के पेड़ के नीचे रख दें। शनिवार को नारियल और बादाम जल में प्रवाहित करें।

अशोक वृक्ष के सात पत्ते मंदिर में रखकर पूजा करें। उनके सूखने पर नये पत्ते पीपल के पेड़ के नीचे रख दें। यह क्रिया नियमित रूप से करें, घर भूत-प्रेस बाधा, नजर दोष आदि से मुक्त रहेगा।

एक कटोरी चावल दान करें और गणेश भगवान को एक पूरी सुपारी रोज चढ़ायें। यह क्रिया एक वर्ष तक करें, नजर दोष व भूत-प्रेस बाधा आदि के कारण बाधित कार्य पूरे होेंगे।

इस तरह से कुछ सरल और प्रभावशाली टोटके हैं, जिनका कोर्इ प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता। ध्यान रहे, नजर दोष, भूत-प्रेत बाधा आदि से मुक्त हेतु टोटके या उाय ही करवाने चाहिए टोना नहीं।

ऐसे पहचानें ऊपरी हवा का असर .............., ऊपरी हवा, बुरी आत्मा क्या कोर्इ पहचान है ? ...........................

हर धर्म की किताबों में ऊपरी हवाओं, नजर दोषों आदि का उल्लेख मिलता है। कुछ ग्रन्थों में इन्हें बुरी आत्मा का साया या असर कहा गया है तो कुछ अन्य किताबों में भूत-प्रेत और जिन्न।

ऐसे पहचानें :-

जब कोर्इ व्यकित दूध पीकर या कोर्इ सफेद मिठार्इ खाकर किसी चौराहे पर जाता है, तब ऊपरी हवाएँ उस पर अपना प्रभाव डालती हैं। गंदी जगहों पर इन हवाओं का वास होता है। इसलिए ऐसी जगहों पर आने वाले लोगों को ये हवायें अपने प्रभाव में ले लेती हैं। इन हवाओं का प्रभाव रजस्वला सित्रयों पर भी पड़ता है। कुँए, बावड़ी आदि पर भी इनका वास होता है। विवाह व अन्य मांगलिक कार्य के अवसर पर ये हवाएँ सक्रिय होती हैं। इसके अतिरिक्त रात और दिन के 12:00 बजे दरवाजे की चौखट पर इनका प्रभाव होता है।

दूध व सफेद मिठार्इ चन्द्र के धोतक हैं। चौराहा राहु का धोतक है, चन्द्र राहु का शत्रु है। अत: जब कोर्इ व्यकित उक्त चीजों का सेवन कर चौराहे पर जाता है, तो उस पर ऊपरी हवाओं के प्रभाव की सम्भावना रहती है।

कोर्इ स्त्री जब राजस्वला होती है, तब उसका चन्द्र व मंगल दोनो दुर्बल हो जाते हैं। ये दोनो राहुल व शनि के शत्रु हैं। रजस्वलावस्था में स्त्री अशुद्ध होती है और शुद्धता राहु की धोतक है। ऐसे में उस स्त्री पर ऊपरी हवाओं के प्रकोप की सम्भावना रहती है।

कुएँ एवं बावड़ी का अर्थ होता है कि जल स्थान और चन्द्र जल स्थान का कारक है। चन्द्र राहु का शत्रु है, इसलिए ऐसे स्थानों पर ऊपरी हवाओं का प्रभाव होता है।

नजर दोष से पीडि़त व्यकित का शरीर कंपकपाता रहता है। वह अक्सर ज्वर, मिरगी आदि से ग्रस्त रहता है।

ऊपरी हवा - पहचान एवं निदान

प्राय: सभी धर्मग्रन्थों में ऊपरी हवाओं, नजर दोषों आदि का उल्लेख है। कुछ ग्रंथों में इन्हें बुरी आत्महा कहा गया है तो कुछ अन्य में भूत-प्रेत और जिन्न।

यहाँ ज्योतिष के आधार पर नजर दोष का विश्लेषण प्रस्तुत है।

ज्योतिष सिद्धान्त के अनुसार गुरू पितृदोष, शनि यमदोष, चन्द्र व शुक्र चल देवी दोष, राहु सर्प व प्रेत दोष, मंगल शाकिनी दोष, सूर्य देव दोष एवं बुध कुल देवता दोष का कारक होता है। राहु, शनि व केतु ऊपरी हवाओं के कारक ग्रह हैं। जब किसी व्यकित के लग्न (शरीर), गुरू (ज्ञान) त्रिकोण (धर्म भाव) तथा द्विस्वभाव राशियों पर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है, तो उस पर ऊपरी हवा की सम्भावना होती है।

लक्षण :-

नजर दोष से पीडि़त व्यकित का शरीर कंपकंपाता रहता है। वह अक्सर मिरगी आदि से ग्रस्त रहता है।

कब और किन परिसिथतियों में डालती हैं ऊपरी हवाएँ किसी व्यकित पर अपना प्रभाव ?

  • जब कोर्इ व्यकित दूध पीकर या कोर्इ सफेद मिठार्इ खाकर किसी चौराहे पर जाता है, तब ऊपरी हवाएँ उस पर अपना प्रभाव डालती हैं। गंदी जगहों पर इन हवाओं का वास होता है, इसीलिए ऐसी जगहों पर हाने वाले लोगों को ये हवाएँ अपने प्रभाव में ले लेती हैं। इन हवाओं का प्रभाव रजस्वला सित्रयों पर भी पड़ता है। कुएँ, बावड़ी आदि पर भी इनका वास होता है। विवाह व अन्य मांगलिक कार्यों के अवसर पर ये हवाएँ सक्रिय होती हैं। इसके अतिरिक्त रात और दिन के 12 बजे दरवाजे की चौखट पर इनका प्रभाव होता है।
  • दूध व सफेद मिठार्इ चन्द्र के धोतक हैं। चौराहा राहु का धोतक है। चन्द्र राहु का शत्रु है। अत: जब कोर्इ व्यकित उक्त चीजों का सेवन कर चौराहे पर जाता है तो उस पर ऊपरी हवाओं के प्रभाव की संभावना रहती है।
  • कोर्इ स्त्री जब राजस्वला होती है, तब उसका चन्द्र व मंगल दोनो दुर्बल हो जाते हैं। ये दोनो राहु व शनि के शत्रु हैं।
  • राजस्व में स्त्री अशुद्ध होती है और अशुद्धता राहु का धोतक हैै। ऐसे में उस स्त्री पर हवाओं के प्रकोप की सम्भावना रहती है।
  • कुएँ एवं बावड़ी का अर्थ होता है कि जल स्थान और चन्द्र जल स्थान का कारक है। चन्द्र राहु का शत्रु है, इसीलिए ऐसे स्थानों पर ऊपरी हवाओं का प्रभाव होता है।
  • जब किसी व्यकित की कुण्डली में किसी भाव विशेष पर सूर्य, गुरू, चन्द्र व मंगल का प्रभाव होता है, तब उसके घर विवाह व मांगलिक कार्य के अवसर हाते हैं, ये सभी ग्रह शनि व राहु के शत्रु हैं, अत: मांगलिक अवसरों पर ऊपरी हवाएँ व्यकित को परेशान कर सकती हैं।
  • दिन व रात के 12:00 बजे सूर्य व चन्द्र अपने पूर्ण बल की अवस्था में होते हैं, शनिव राहुल इनके शत्रु हैं, अत: इन्हें प्रभावित करते हैं। दरवाजे की चौखट राहु की धोतक हैं। अत: राहु क्षेत्र में चन्द्र या सूर्य को बल मिलता है, तो ऊपरी हवा सक्रिय होने की संभावना प्रबल होती है।
  • मनुष्य की दायीं आँख पर सूर्य की और बांयी पर चन्द्र का नियंत्रण होता है। इसीलिये ऊपरी हवाओं का प्रभाव सबसे पहले आँखों पर ही पड़ता है।

यही ऊपरी हवाओं से सम्बद्ध ग्रहों, भावों आदि का विश्लेषण प्रस्तुत है।

राहु-केतु :

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, शनिवत राहु ऊपरी हवाओं का कारक है। यह प्रेत बाधा का सबसे पमुख करक है। इस ग्रह का प्रभाव जब भी मन, शरीर, ज्ञान, धर्म आत्मा आदि के भावों पर होता है, तो ऊपरी हवायें सक्रिय होती है।

शनि :

इसे भी राहु के समान माना गया है। यह भी उक्त भावों से सम्बन्ध बनाकर भूत-प्रेत पीड़ा देता है।

चन्द्र :

मन पर जब पाप ग्रहों राहु और शनि का दूषित प्रभाव होता है अशुभ भाव सिथत चन्द्र बलहीन होता है, तब व्यकित भूत-प्रेत पीड़ा से ग्रस्त होता है।

गुरू :

गुरू सातिवक ग्रह है। शनि, राहु या केतु से सम्बन्ध होने पर यह दुर्बल हो जाता है। इसकी दुर्बल सिथति में ऊपरी हवाएँ जातक पर अपना प्रभाव डालती हैं।

लग्न :

यह जातक के शरीर का प्रतिनिधित्व करता है। इसका सम्बन्ध ऊपरी हवाओं के कारक राहु, शनि या केतु से हो या इस पर मंगल का पाप प्रभाव प्रबल हो, तो व्यकित के ऊपरी हवाओं से ग्रस्त होने की सम्भावना बनती है।

पंचम :

पंचम भाव से पूर्व जन्म के संचित कर्मों का विचार किया जाता है। इस भाव पर जब ऊपरी हवाओं के कारक पाप ग्रहों का प्रभाव पड़ता है, तो इसका अर्थ यह है कि व्यकित से पूर्व जन्म के अच्छे कर्मों में कमी है। अच्छे कर्म अल्प हों, तो प्रेत बाधा योग बनता है।

अष्टम :

इस भाव को गूढ़ विधाओं व आयु तथा मृत्यु का भाव भी कहते हैं। इसमें चन्द्र और पाप ग्रह या ऊपरी हवाओं के कारक ग्रह का सम्बन्ध प्रेत बाधा को जन्म देता है।

नवम :

यह धर्म भाव है। पूर्व जन्म में पुण्य कर्मों में कमी रही हो, तो यह भाव दुर्बल होता है।

राशियाँ :

जन्म कुण्डली में द्विस्वभाव राशियों मिथुन, कन्या और मीन पर वायु तत्व ग्रहों का प्रभाव हो, तो प्रेत बाधा होती है।

वार :

शनिवार, मंगलवार, रविवार को प्रेत बाधा की सम्भावनाएँ प्रबल होती हैं।

तिथि :

रिक्त तिथि एवं अमावस्या प्रेत बाधा को जन्म देती है।

नक्षत्र :

वायु संज्ञक नक्षत्र प्रेत बाधा के कारक होते हैं।

योग :

विष्कुंभ, व्याधात, ऐन्द्र, व्यतिपात, शूल आदि योग प्रेत बाधा को जन्म देते हैं।

कारण :

विषिट, किस्तुन और नाग करणों के कारण व्यकित प्रेस बाधा से ग्रस्त होता है।

दशाएँ :

मुख्यत: शनि, राहु, अष्टमेश व राहु तथा केतु से पूर्णत: प्रभावित ग्रहों की दशान्तर्दशा में व्यकित के भूत-प्रेत बाधाओं से ग्रस्त होने की सम्भावना रहती है।

युति :

किसी स्त्री के सप्तम भाव में शनि, मंगल और राहु या केतु की युति हो, तो उसके पिशाच पीड़ा से ग्रस्त होने की सम्भावना रहती है।

गुरू नीच राशि अथवा नीच राशि के नवांश में हो, या राहु से युत हो और उस पर पाप गहों की दृषिट हो, तो जातक की चांडाल प्रवृत्ति होती है।

पंचम भाव में शनि का सम्बन्ध बने तो व्यकित प्रेस एवं क्षुद्र देवियों की भकित करता है।

ऊपरी हवाओं के कुछ अन्य मुख्य ज्योतिषीय योग-

  • यदि लग्न, पंचम, षष्ठ, अष्टम या नवम भाव पर राहु, केतु, शिन, मंगल, क्षीण चन्द्र आदि का प्रभाव हो, तो जातक के ऊपरी हवाओं से ग्रस्त होने की सम्भावना रहती है। यदि उक्त ग्रहों का परस्पर सम्बन्ध हो तो जातक प्रेत आदि से पीडि़त हो सकता है।
  • यदि पंचम भाव में सूर्य और शनि की युति हो, सप्तम में क्षीण चन्द्र हो तथा द्वादश में गुरू हो, तो इस सिथति में भी व्यकित प्रेत बाधा का शिकार होता है।
  • यदि लग्न पर क्रूर ग्रहों की दृषिट हो, लग्न निर्बल हो, लग्नेश पाप स्थान में हो अथवा राहु या केतु से युत हो, तो जातक जादू टोने से पीडि़त होता है।
  • लग्न में राहु के साथ चन्द्र हो तथा त्रिकोण में मंगल, शनि अथवा कोर्इ अन्य क्रूर ग्रह हो, तो जातक भूत-प्रेत आदि से पीडि़त होता है।
  • यदि षष्ठेश लग्न में हो, लग्न निर्बल हो और उस पर मंगल की दृषिट हो, तो जातक जादू टोने से पीडि़त होता है। यदि लग्न पर किसी अन्य शुभ ग्रह की दृषिट न हो, तो जादू-टोने से पीडि़त होने की सम्भावना प्रबल होती है। षष्ठेश के सप्तम या दशम में सिथत होने पर भी जातक जादू-टोना से पीडि़त हो सकता है।
  • यदि लग्न में राहु पंचम में शनि तथा अष्टम में गुरू हो, तो जातक पे्रत शाप से पीडि़त होता है।

''ऊपरी हवाओं के सरल उपाय''

ऊपरी हवाओं से मुकित हेतु शास्त्रों में अनेक उपाय बताये गये हैं। अर्थवेद में इस हेतु कर्इ मंत्रों व स्तुतियों का उल्लेख है।

आयुर्वेद में भी इन हवाओं से मुकित के उपायों का विस्तारण से वर्णन किया गया है। यहां कुछ प्रमुख सरल एवं प्रभावशाली उपायों का विवरण प्रस्तुत है।

  • ऊपरी हवाओं से मुकित हेतु हनुमान चालीसा का पाठ और गायत्री का जप तथा हवन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त अगिन तथा लाल मिर्जी चलानी चाहिये।
  • रोज सूर्यास्त के समय एक साफ-सुथरे बर्तन में गाय का आधा किलो दूध लेकर उसमें शुद्ध शहद की नौ बूँदें मिला लें। फिर स्नन करके, शुद्व वस्त्र पहनकर मकान की छत से नीचे तक प्रत्येक कमरे, जीने, गैलरी आदि में उस दूध के छींटे देते हुए द्वार तक आयें और बचे हुए दूध को मुख्य द्वार के बाहर गिरा दें।
  • क्रिया के दौरान इष्टदेव का स्मरण करते रहें। यह क्रिया इक्कीस दिन तक नियमित रूप से करें, घर पर प्रभावी ऊपरी हवाएँ दूर हो जायेंगी।
  • रविवार को बांह पर काले धतूरे की जड़ बांधे, ऊपरी हवाओं से मुकित मिलेगी।
  • लहसुन के रस में हींग घोलकर आँख में डालने या सूँधने से पीडि़त व्यकित को ऊपरी हवाओं से मुकित मिल जाती है।
  • ऊपरी बाधाओं से मुकित हेतु निम्नोक्त मंत्र का यथासम्भव जपकरना चाहिये।
  • ष ओम नमो भगवते रूद्राय नम: कोशेश्रस्य नमो ज्योति पंतगाय नमो रूद्राय नम: सिद्धि स्वाहा।।
  • घर के मुख्य द्वार के समीप स्वेतार्क का पौधा लगायें, घर ऊपरी हवाओं से मुक्त रहेगा।
  • उपले या लकड़ी के कोयले जलाकर उसमें धूनी की विशिष्ट वस्तुएँ डालें और उसमें उत्पन्न होने वाला धुआँ पीडि़त व्यकित को सुंघाएँ। यह क्रिया किसी ऐसे व्यकित से करवायें जो अनुभवी हो और जिसमें पर्याप्त आत्मबल हो।
  • प्रात: काल बीच मंत्र इक्लीश का उच्चारण करते हुए काली मिर्ज के नौ दाने सिर पर से घुमाकर दक्षिण दिशा की ओर फेंक दें ऊपरी बला दूर हो जायेगी।
  • रविवार को स्नानादि से निवृत्त होकर काले कपड़े की छोटी थैली में तुलसी के आठ पत्ते, आठ काली मिर्च और सहदेर्इ की जड़ बाँधकर गले में धारण करें, नजर दोष जप करके सरसों का तेल अभिमंत्रित कर लें और उसमें पीडि़त व्यकित के शरीर पर मालिश करें, व्यकित पीड़ामुक्त हो जायेगा।
  • मंत्र : ओम नमो काली कपाला देहि-देहि स्वाहा।
  • ऊपरी हवाओं के शकितशाली होने की सिथति में शाबर मंत्रों का जप एवं प्रयोग किया जा सकता है। प्रयोग करने के पूर्व इन मंत्रों का दीपावली की रात को अथवा होलिका दहन की रात को जलती हुर्इ होली के सामने या फिर शमशान में 108 बार जप कर इन्हें सिद्ध कर लेना चाहिए। यहां यह उल्लेख कर देना आवश्यक है कि इन्हें सिद्ध करने के इच्छुक साधकों में पर्याप्त आत्मबल होना चाहिए, अन्यथा हानि हो सकती है।
  • निम्न मंत्र से थोड़ा सा जीरा 7 बार अभिमंत्रित कर रोगी के शरीर से स्पर्श करायें और उसे अगिन में डाल दें। रोगी को इस सिथति में बैठना चाहिए कि उसका धूआँ उसके मुख के सामने आये। इस प्रयोग से भूत-प्रेत बाधा की निवृत्ति होती है।
  • मंत्र : जीरा जीरा महाजीरा जिरिया चलाय। जिरिया की शकित से फलानि चलि जाय।। जीये तो रमटले मोहे तो मशान टले।
  • हमारे जीरा मंत्र से अमुख अंग भूत चले।। जाय हुक्म पाड़ुआ पीर की दोहार्इ।